नाच नाच कर भगाइए अल्जाइमर
१४ मई २०१२वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि मस्तिष्क की कसरत की जाए तो इस तरह की बीमारी से बचा जा सकता है. शरीर की कसरत के तो कई तरीके हैं - दौड़ भाग की जा सकती है, खेल कूद में वक्त बिताया जा सकता है. लेकिन मस्तिष्क की कसरत कैसे की जाए? इसके लिए कोई नई भाषा सीखी जा सकती है या फिर संगीत, डांस सीखा जा सकता है. इन कामों के लिए हमें अपना ध्यान केंद्रित करना होता है और इसी तरह मस्तिष्क की कसरत हो पाती है. अक्सर लोग अखबार में मिलने वाले कई तरह के ब्रेन गेम्स की मदद लेते हैं. लेकिन जर्मन सेंटर फॉर न्यूरो डीजनरेटिव डिजीजेस (डीजेडीएनई) के आंद्रे फिशर का इस बारे में कहना है, "बीस साल तक सुडोकू या क्रॉसवर्ड पजल सुलझाने से कुछ नहीं होगा. आपको अपने दिमाग को पूरी तरह काम पर लगाना है."
केमिकल लोचा
जर्मनी के गोएटिंगन में स्थित डीजेडएनई का मुख्य उद्देश्य है इस बीमारी की जड़ तक जाना. फिशर बताते हैं, "हम मस्तिष्क के रोगों में कोशिका और अणु संबंधी प्रक्रिया को समझना चाहते हैं. हम अल्जाइमर में दिमाग में होने वाले बदलावों को समझना चाहते हैं ताकि इसके उपचार के लिए कारगर तरीके ढूंढ सकें."
फिशर का कहना है कि उनके पास इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि व्यक्तिगत स्तर पर सेहत या बीमारी पर हमारी जीन संरचना और वातावरण का पारस्परिक प्रभाव पड़ता है. फिशर इस विषय पर शोध भी कर रहे हैं. वह बताते हैं, "लंबे समय तक इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि मस्तिष्क अपना लचीलापन कैसे खोने लगता है. आज हमें लगता है कि इसका कारण कोशिकाओं में होने वाले बदलाव हैं."
जब व्यक्ति जवान होता है तब मस्तिष्क बिना किसी दिक्कत के ढ़ेर सारी जानकारी जमा कर लेता है. फिशर बताते हैं कि मस्तिष्क की कोशिकाओं में मौजूद क्रोमेटिन इसमें मददगार साबित होता है, "क्रोमेटिन, जो की डीएनए की रीढ़ की हड्डी जैसा है, वह खुलता है और जानकारी जमा हो जाती हैं." क्रोमेटिन कोशिकाओं के केंद्र में पाया जाता है और यह प्रोटीन और डीएनए से बना होता है. फिशर बताते हैं कि यादाश्त के कमजोर होने का कारण डीएनए नहीं बल्कि डीएनए और प्रोटीन में उलझ कर बने क्रोमेटिन होते हैं.
कैंसर के इलाज से सीख
क्रोमेटिन का लचीलापन एचडीएसी नाम के एंजाइम पर भी निर्भर करता है. इस एंजाइम के कारण लचीलापन कम हो जाता है और यादाश्त कमजोर होने लगती है. लेकिन अगर इस एंजाइम को रोक दिया जाए तो याद करने की प्रक्रिया एक बार फिर सामान्य हो जाती है. फिशर को उम्मीद है की वह ऐसे तरीके ढूंढ सकेंगे जिनसे इस एंजाइम को रोका जा सके. वह चूहों पर इसका प्रयोग कर चुके हैं और उन्हें सकारात्मक नतीजे भी मिले हैं.
कैंसर के इलाज में भी कुछ ऐसा ही किया जाता है. वहां एचडीएसी एंजाइम को रोकने के लिए माइक्रो आरएनए शरीर में डाले जाते हैं. हालांकि कैंसर के इलाज में यह तरीका काफी कारगर साबित हुआ है. लेकिन फिशर को इस बात की उम्मीद है कि अल्जाइमर के इलाज में भी उतना ही फायदा मिल पाएगा. उनका कहना है कि ऐसे इलाज में तो अभी वक्त लगेगा, पर तब तक लोगों को मस्तिष्क की कसरत पर ध्यान देना चाहिए, "नाचिए. इस से मानसिक और शारीरिक बदलाव दोनों एक साथ होते हैं."
आईबी/एएम (डीपीए)